झारखण्ड - यहां स्कूल जाने को सर्कस सा करतब करते हैं बच्चे,बांस से बने जुगाड़नुमा खतरनाक पुल को पार करना है मजबूरी - Primary Ka Master || UPTET, Basic Shiksha News, TET, UPTET News
  • primary ka master

    LATEST PRIMARY KA MASTER - BASIC SHIKSHA NEWS TODAY


    Tuesday, 6 November 2018

    झारखण्ड - यहां स्कूल जाने को सर्कस सा करतब करते हैं बच्चे,बांस से बने जुगाड़नुमा खतरनाक पुल को पार करना है मजबूरी

    झारखण्ड - यहां स्कूल जाने को सर्कस सा करतब करते हैं बच्चे,बांस से बने जुगाड़नुमा खतरनाक पुल को पार करना है मजबूरी

    शिक्षा हासिल करने के लिए सर्कस सरीखा करतब। सर्कस में तो फिर भी नीचे जाल लगा होता है, गिरने पर जान बच जाती है। यहां तो मौत पक्की। दो मौतें हो भी चुकी हैं। लेकिन स्कूल जाना है तो रास्ता बस यही है। बच्चे रोज जान हथेली पर रख कर बांस के एक बेहद संकरे और ऊंचे जुगाड़नुमा पुल को पार करने का दुस्साहस करते हैं।1कोई पैदल ही पार करता है तो कोई कंधे पर साइकिल टांगे। करीब 25 फुट नीचे नदी की धारा बहती है। तीन बांस की चौड़ाई के पुल पर 50 मीटर का सफर कई बार कलेजे को कंपा देता है। बावजूद उनका सफर जारी है। सांसों को थाम देने वाला यह नजारा हर रोज झारखंड के पाकुड़ जिले की गंधाईपुर पंचायत के गोपीनाथपुर गांव में देखा जा सकता है। मसना नदी पर लोगों ने जुगाड़ का पुल बना रखा है। दर्जनों बच्चे इसी पुल से नदी पार कर पढ़ने के लिए जाते हैं। ग्रामीण कहते हैं कि पुल ऐसा है कि जरा सी असावधानी से मौत हो सकती है। लेकिन कोई और जरिया भी तो नहीं।1बावजूद इसके, बच्चों का तालीम के प्रति जज्बा उन्हें हर रोज इस पुल की चुनौती को पार कराता है। उच्च विद्यालय अंतरदीपा में कक्षा नौ के छात्र सोहन मंडल, कक्षा छह की छात्र रानी कुमारी, कोचिंग छात्र अब्दुल कासिम का कहना है कि स्कूल नहीं जाएंगे तो अनपढ़ रह जाएंगे, लिहाजा हम पुल को बिना डरे पार करते हैं। बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के अंतरदीपा गांव के स्कूलों में पढ़ाई व कोचिंग के लिए जाने वाले ये बच्चे कहते हैं, हमारे गांव में प्राथमिक स्कूल है। पर यहां शिक्षकों की कमी है। 1गोपीनाथपुर के शुभोजीत मंडल बताते हैं कि करीब दस वर्ष पहले पुल बनाया गया था। जो दर्जनों बांसों को नदी में खंभे की तरह खड़ाकर बनाया गया है। इस नदी पर एक अन्य पक्का पुल बना है, पर वह गांव से दूर है। वहां तक जाने का मार्ग भी खराब है। इसलिए यही बांस का पुल लोगों का एकमात्र सहारा है। यह खतरनाक है, पर हमारी आदत बन गई है। बहुत सावधानी रखते हैं, बावजूद इसके इस पुल से गिरने से दो लोगों की मौत हो चुकी है। सुमित के पिता सुदीप सरकार कहते हैं कि पहले बच्चे को भेजने में डर लगता था। मन में हमेशा आशंका बनी रहती है। पर बच्चे की पढ़ाई के लिए सब मंजूर है। यदि गांव में ही बेहतर स्कूल और अन्य शिक्षा सुविधाएं मुहैया करा दी जाएं तो बच्चों को बाहर नहीं जाना पड़ेगा। हालांकि ग्रामीण भी रोजी रोजगार और आवागमन के लिए इसी पुल का इस्तेमाल करते हैं। गांव वालों ने बताया कि पुल पर हमेशा ग्रामीण नजर रखे रहते हैं। कोई भी बांस यदि कमजोर होता है तो तुरंत उसे बदल देते हैं। गंधाईपुर पंचायत मुखिया अताउर रहमान कहते हैं कि गांव की करीब दो हजार की आबादी के लिए नदी के पार जाने को यह पुल ही सहारा है। कई बार स्थानीय लोगों ने नदी पर पुल बनाने की मांग की पर कोई सुनवाई नहीं हुई। तब ग्रामीणों ने खुद ही पुल बना लिया।


    PRIMARY KA MANSTER WEELKY TOP NEWS

    PRIMARY KA MASTER MONTHLY TOP NEWS

    PRIMARY KA MASTER TOP NEWS