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    Friday, 31 May 2019

    उस मास्टर की तलाश होनी चाहिये जिसने सीबीएसई टॉपर्स का एक नम्बर काट लिया.....पढ़ें आलेख सीबीएसई बोर्ड मूल्याँकन पर

    उस मास्टर की तलाश होनी चाहिये जिसने सीबीएसई टॉपर्स का एक नम्बर काट लिया और उन्हें 499 पर ही अटका दिया,वरना 500 में 500 का परचम लहराते हमारा देश पूरी दुनिया में अपनी शैक्षणिक गुणवत्ता का डंका पीट रहा होता। वैसे 500 में 499 की खबरें छापते मीडिया मुग्ध... तो व्यवस्था आत्ममुग्ध है। अभिभावकों का हवा में उड़ना तो स्वाभाविक ही है।
    उस मास्टर की तलाश होनी चाहिये जिसने सीबीएसई टॉपर्स का एक नम्बर काट लिया.....पढ़ें आलेख सीबीएसई बोर्ड मूल्याँकन पर

        हिन्दी में 100 में 100, इतिहास में 100 में 100...अब क्या चाहिये! अंकपत्रों से शिक्षण की गुणवत्ता, परीक्षण की गहनता और परीक्षार्थियों की संपूर्णता के जो साक्ष्य सामने आए हैं उससे इतनी आश्वस्ति तो मिलती ही है कि स्कूली शिक्षा, उसके पाठ्यक्रम, शिक्षण-परीक्षण की गुणवत्ता आदि पर हमें चिंतित होने की कोई जरूरत नहीं। ऑल इज वेल...।
       लेकिन, नहीं। चिंतित होने की जरूरत है। यह जश्न मनाने का नहीं, सोचने का वक्त है। आखिर वे कौन सी कसौटियां हैं जो परीक्षार्थियों की उपलब्धियों को इस तरह निर्धारित करती हैं? इन कसौटियों के निर्धारक कौन हैं, उनकी सैद्धांतिकी क्या है, प्रक्रिया की व्यावहारिकताएँ क्या हैं?

         जब 90 प्रतिशत या उसके आसपास अंक लाने पर छात्र उदास हो जाए और अभिभावक चिंतित हो जाएं तो समझना चाहिये कि चीजें गलत दिशा में जा रही हैं। यह दूसरी, तीसरी क्लास की नहीं, 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं का मामला है। 500 में 499, 498, 497...नहीं, यह सही नहीं। कुछ न कुछ तो ऐसा है जिसे लेकर अकादमिक नियंताओं को सोचना होगा।
         10वीं और 12वीं के छात्रों को सिर्फ सूचना ग्रहण करने की नहीं, उन सूचनाओं का विश्लेषण करने की क्षमता भी होनी चाहिये। इस क्षमता को विकसित करने के प्रयास होने चाहिये। अगर परीक्षा में विश्लेषण मूलक प्रश्नों का भी समावेश हो तो अंकों के प्रतिशत का ग्राफ गिरेगा लेकिन छात्रों का बेहतर मानसिक विकास होगा।

       लेकिन...यह व्यवस्था के लिये सही नहीं होगा कि युवा कम उम्र से ही अपनी विश्लेषणात्मक क्षमताओं का विकास करें। कारपोरेट की मुट्ठियों में फड़फड़ाती व्यवस्था की अपनी सोच है, अपनी सीमाएं हैं, अपने षड्यंत्र हैं।
           बिहार स्कूल परीक्षा बोर्ड का तो मामला ही अलग है। यह सीधे-सीधे गरीब छात्रों और अभिभावकों के साथ छल पर उतर आया है...और यहां भी मीडिया मुग्ध और अभिभावक आत्ममुग्ध हैं। खबरें आईं कि बिहार बोर्ड की मैट्रिक और इंटर की परीक्षाओं का जो रिजल्ट आया है वह पिछले वर्षों के मुकाबले बहुत बेहतर है।
             अधिक दिन नहीं बीते, महज दो-तीन वर्ष पहले हालत यह थी कि बिहार में 10वीं-12वीं का रिजल्ट निकलता था और कोहराम मच जाता था। आधे से अधिक परीक्षार्थी फेल। पूरा स्कूली सिस्टम औंधे मुंह पड़ा नजर आता था।

        इस बार...जब बोर्ड चेयरमैन और बिहार सरकार के अन्य अधिकारी चहकते चेहरों के साथ प्रेस को सूचना दे रहे थे कि इस बार रिजल्ट शानदार हुआ है, कि हम अंधेरों से निकल कर उजालों की ओर बढ़ रहे हैं...तो उन्हें यह भी बताना चाहिये था कि इस शानदार रिजल्ट का राज क्या है। आखिर यह कैसे हुआ कि जिस बोर्ड की परीक्षाओं में अभी साल-दो साल पहले आधे से अधिक बच्चे फेल कर रहे थे, वे इतनी बड़ी मात्रा में पास कैसे होने लगे? अंकों का प्रतिशत एकबारगी इतना बढ़ने कैसे लगा।
       रिजल्ट खराब होने के जो कारण थे उनमें ऐसे कौन से सुधार किए गए कि अचानक से इसमें इतनी बेहतरी आने लगी। माना कि बिहार के मास्साब लोग अधिक अंक देने में हिचकिचाते हैं और आप ने उन्हें अधिक अंक देने के लिये हड़काया। लेकिन, क्या यही एक कारण है कि छात्रों की उपलब्धियों के ग्राफ में इतना उछाल आ गया?

       बीते दो-तीन साल में बिहार की स्कूली शिक्षा में ऐसे क्या सकारात्मक बदलाव आए कि रिजल्ट में इतना उछाल आ गया? क्या आवश्यकता के अनुरूप शिक्षकों की नियुक्ति हो गई? क्या प्रायोगिक वर्ग नियमित होने लगे? क्या अंग्रेजी, विज्ञान और गणित के शिक्षकों की कमी से जो अराजकता थी, वह दूर हो गई?

       नहीं, कुछ नहीं हुआ। शिक्षकों की नियुक्ति तो नहीं ही हुई, जो शिक्षक हैं भी, वे अपने वाजिब वेतन के लिये सड़क से लेकर कोर्ट तक का चक्कर लगा रहे हैं। अंग्रेजी, गणित और विज्ञान के शिक्षकों  की भयानक कमी बदस्तूर जारी है। सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं जहां इन विषयों में एक भी शिक्षक नहीं। अतिथि शिक्षकों का फार्मूला पिट चुका।
      
         फिर...ऐसा क्या हुआ कि रिजल्ट के ग्राफ में इतना उछाल आया? क्या यह उस हास्यास्पद स्थिति से पीछा छुड़ाने की सरकारी कोशिश नहीं है जब देश भर के अखबारों में बिहार के रिजल्ट पर टिप्पणियां होने लगी थीं। आखिर, आधे से भी अधिक बच्चों का फेल हो जाना बच्चों से अधिक व्यवस्था की असफलता है।
        सीबीएसई का रिजल्ट जहां अकादमिक नियंताओं से आत्मचिन्तन की अपेक्षा करता है, वहीं बिहार के रिजल्ट गहरे संदेह पैदा करते हैं। और हां...सीबीएसई के रिजल्ट का विश्लेषण करते समय इस बिंदु पर भी विचार किया जाना चाहिये कि 95 प्रतिशत से अधिक अंक लाने वाले बच्चों की अधिकतर संख्या किन स्कूलों से है? उनका वर्गीय आधार क्या है?
        
          आप जितना ही विश्लेषण करेंगे, उतने ही सवाल जन्म लेते जाएंगे।
    Hemant Kumar Jha  की कलम से साभार
    वाया Raju S. Yadav

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