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    Friday, 31 May 2019

    पीठासीन की डायरी - चुनावी समर में इलेक्शन ड्यूटी की तैयारियों पर आलेख

    पीठासीन की डायरी - चुनावी समर में इलेक्शन ड्यूटी की तैयारियों पर आलेख

             मतदान कर्मियों से लदी बस खचाखच भरी हुई थी। लोकतंत्र के महात्यौहार में अपना योगदान देने के लिए तैयार सभी पीठासीन अधिकारी और मतदान अधिकारी बस में बैठे- बैठे अपने अपने पोलिंग बूथों की कल्पना कर रहे थे। लेकिन ड्राइवर था कि बस स्टार्ट करने का नाम ही नहीं ले रहा था। सारी बसें रवाना हो चुकी थी लेकिन हमारी बस की रवानगी का कोई अता-पता नहीं था। 
    पीठासीन की डायरी - चुनावी समर में इलेक्शन ड्यूटी की तैयारियों पर आलेख

           जब सब्र का बांध टूट गया तो मैंने ड्राइवर से पूछा कि - "भाई कब चलोगे ?"
           " साहब एक रवानगी के आर्डर पर जब तक दस्खत नहीं हो जाते तब तक मैं बस नहीं चला सकता"  ड्राइवर ने लाचारी जताई।
          मैंने पूछा_ "अच्छा किसके साइन होने हैं रवानगी के आर्डर पर?"
         ड्राइवर ने बताया कि - "कोई पीठा सिंह साहब हैं जिनके दस्खत  होने हैं।"
    अब मेरे लिए अपनी हंसी रोकना बहुत कठिन हो रहा था। लेकिन जैसे तैसे मैंने संभलते हुए कहा - 
          "अरे भाई "पीठा सिंह" (पीठासीन अधिकारी) तो कब से बस के अंदर ही बैठे हुए हैं। तुमने पूछा क्यों नहीं अब तक? चलो मैं मिलवाता हूं तुम्हें पीठा सिंह साहब से, जहां दस्खत कराने हैं करा लो।"
       बस में बैठे अपनी पोलिंग पार्टी के पीठासीन अधिकारी को ड्राइवर का से परिचय कराते हुए मैंने कहा कि रवानगी के कागज़ पर आपके यानी कि "पीठा सिंह" साहब के दस्खत होने हैं। अपना नया नाम सुनकर पीठासीन अधिकारी भी मुस्कुराये बिना न रह सके। लेकिन हमारी बस में पांच पोलिंग पार्टियां बैठी थी तो "पीठा सिंह" भी पांच बैठे थे। अतः ड्राइवर ने सभी पांच "पीठा सिंह" साहब के दस्खत कराये और चल पड़ा पोलिंग बूथ की ओर।
       ये बस किसी प्राइवेट स्कूल की थी जो कुछ दिनों के लिए चुनाव आयोग ने अपने कब्जे में ले रखी थी। अब किसकी हिम्मत है जो चुनाव आयोग को बस देने से मना कर सके? ऐसा लग रहा था कि बस चल नहीं रही है सरक रही है हमारी सरकारों की तरह। गर्मी से परेशान होकर जब पीठा सिंह साहब ने ड्राइवर से थोड़ा तेज चलने को कहा तो उधर से जवाब आया कि बस में स्पीड गवर्नर लगा है इसलिए तेज नहीं चल सकती।
           पीठा सिंह साहब की परेशानी का मुख्य कारण "वीवी पैट" मशीन (VVPAT -Voter-verified paper audit trail) थी। इसके बारे में चुनाव आयोग ने प्रशिक्षण में इतनी सख्ती से ट्रेनिंग दी थी पीठा सिंह डर के मारे  इसे "बीबी" पैड समझ पर गोदी में बैठाये हुए थे।
          चुनाव की ट्रेनिंग में पीठा सिंह साहब को यह भी समझाया गया था पोलिंग के दिन अपने पोलिंग बूथ में वो दुनियां के सबसे ताकतवर तानाशाह के बराबर शक्तियों के स्वामी होंगे। ठीक वैसे ही जैसे एक फिल्म में नायक एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बन जाता है। पीठा सिंह को जीवन में इतनी ताकत कभी नहीं मिली थी। और इसका दूसरा पक्ष यह था कि अगर छोटी सी भी शिकायत मिली तो पीठा सिंह को ठीक वैसे ही बलि का बकरा बनाया जाएगा जैसे जनक्रांति होने पर किसी तानाशाह को बनाया जाता है।
       मूल रूप से पीठा सिंह एक शिक्षक था लेकिन आज पहली बार उसके पदनाम के आगे "अधिकारी" शब्द जुड़ा था तो उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अपनी हालत का जश्न मनाये या मातम?
           बस से उतरते ही पीठा सिंह ने इलैक्ट्रिक वोटिंग मशीन वाला बैग पीठ पर लादा और मातहत मतदान कर्मियों को आदेश दिया कि वो पोलिंग बूथ की सभी व्यवस्थाएं दुरुस्त करें। उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि लोकतंत्र उसी की पीठ पर सवार होकर मंजिल तक पहुंचने की तैयारी कर रहा है।
      मैं भी अपना बैग और बैलट यूनिट उठाये पीठा सिंह साहब के पीछे पीछे चल पड़ा वो कहावत याद करते हुए कि "साहब के अगाडी और घोड़े के पिछाडी कभी नहीं चलना चाहिए। लेकिन जिस तरह पीठा सिंह की पीठ पर लोकतंत्र की मजबूती का बोझ चुनाव आयोग ने लादा हुआ था,मैं समझ नहीं पा रहा था कि पीठा सिंह साहब है या पालतू जानवर?
       खैर तो साहब जैसे तैसे  हमने भी पीठा सिंह और मच्छरों  के साथ रात गुजारी। दूसरे दिन सुबह मतदान शुरू हुआ तो वोटर लिस्ट में बड़े कमाल के नाम थे। एक साहब आये जिनका नाम "कमलापति" था, लेकिन उनकी पत्नी का नाम "कमला" नहीं था। दिमाग पर बहुत जोर डालने के बाद भी समझ में नहीं आया कि जब उनकी पत्नी कमला नहीं थी तो उनका नाम कमलापति क्यों था? एक पति पत्नी आये जिनमें से एक का नाम गंगा सिंह था और दूसरे का नाम गंगा देवी। अब बताइए कोई एसे नाम भी रखता है भला कि पता करना मुश्किल हो जाय कि कौन आदमी है और कौन औरत? वो तो पीठा‌ सिंह जैसे बुद्धिमान व्यक्ति ने नाम से ही पहचान लिया वरना बबाल होने में देर थोड़ी लगती है।
         कुछ वोटर पूछ रहे थे कि कौन सा वाला बटन दबाना है यानी कि वोट किसको देना है? ये बड़ा समस्यात्मक प्रश्न था। यह प्रश्न सुनकर पीठा सिंह हैरान रह गया, लोकतंत्र के प्रति सारा उत्साह जाता रहा। क्या ऐसे ही लोगों के लिए वो अपनी नौकरी दांव‌ पर "पीठा सिंह" बना था?
          मतदान खत्म हुआ। मतदान के बाद तैयार किए जाने वाले सभी आवश्यक लिफाफे "पीठा सिंह" ने मतदान से पहले वाली रात को ही सोने से पहले तैयार कर लिये थे। हरे, नीले, सफेद,भूरे हर रंग के दर्जनों लिफाफे थे जो सील करके ए आर ओ को देने थे। ये लिफाफे क्यों बनाते हैं ये बात किसी को पता नहीं थी। बस बनाने हैं तो बनाने हैं आखिर रस्म अदायगी भी तो कोई चीज होती है। पीठा सिंह समझ नहीं पा रहा था कि जब पोलिंग इलैक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में होनी है तो इन लिफाफों को बनाने में  करदाता का पैसा बर्बाद करने का क्या औचित्य है?
             रात के दस बजे तक जैसे तैसे चार पोलिंग पार्टियां बस में बैठे चुकी थी। ड्राइवर पीठा सिंह साहब को देखकर खुश था कि इस बार उसे दस्खत कराने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। पांचवीं पोलिंग पार्टी का पीठा सिंह नया था तो ये लिफाफे बनाने की कला उसे नहीं आती थी इस कारण बहुत परेशान था। वो बहुत तनाव में था कि अब तो लग गई नौकरी दांव पर। पुराने पीठा सिंहों ने उसे समझाया कि ये लिफाफे संकलन केन्द्र में जाकर भी तैयार किये जा सकते हैं। और इस तरह समझा बुझाकर उसे बस में बैठने के लिए राजी किया गया। 
    संकलन केन्द्र में तीन घंटे तक लाइन में खड़े रहने के बाद चार पोलिंग पार्टियां तो जैसे तैसे अपना सामान जमा कराने में कामयाब हो गई लेकिन पांचवां पीठा सिंह भूखा-प्यासा ही लिफाफे बनाने में संघर्ष कर रहा है। आपके पास अगर समय हो तो कृपया पीठा सिंह की मदद करके लोकतंत्र को मजबूत करने की कोशिश करें वर्ना कहीं ऐसा ना हो कि किसी दिन हमारे लोकतंत्र के भार से दबकर पीठा सिंह दम तोड दे।                             डॉ डी एन भट्ट

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