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    Monday, 13 May 2019

    शिक्षा बोर्डों के रिजल्ट में शत-प्रतिशत नंबर पर शिक्षाविदों ने जताई चिंता • एनबीटी, लखनऊ : काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल स...

    शिक्षा बोर्डों के रिजल्ट में शत-प्रतिशत नंबर पर शिक्षाविदों ने जताई चिंता • एनबीटी, लखनऊ : काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल स...





    शिक्षा बोर्डों के रिजल्ट में शत-प्रतिशत नंबर पर शिक्षाविदों ने जताई चिंता

    • एनबीटी, लखनऊ : काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन (आईसीएसई) के नतीजों में कोलकाता के देवांग और बेंगलुरु की विभा को 100% अंक मिले हैं। वहीं, सीबीएसई के टॉपर को 500 में से 499 अंक प्राप्त हुए हैं। नंबरों की बारिश में निकल रहे टॉपरों से अभिभावक, बोर्ड और स्कूल भले ही अपनी पीठ थपथपा रहे हों, लेकिन शिक्षाविदों के माथे में चिंता की लकीरें बढ़ गई हैं। शिक्षाविदों के मुताबिक, शत-प्रतिशत अंक मिल जाता बच्चों से ज्यादा शिक्षकों पर सवालिया निशान खड़ा कर रहा है। नंबरों की होड़ से बच्चों की प्रतिभा प्रभावित हो रही है। शिक्षाविदों से दो टूक:
    'शिक्षा व्यवस्था को बिगाड़ रही बोर्ड में नंबरों की बारिश'
    बच्चों की सोचने, समझने की शक्ति हो रही कम

    मौजूदा समय में मल्टीपल चॉइस क्वेशचन की संख्या बढ़ा दी गई है। इससे बच्चा सिलेबस को बहुत गहराई से नहीं पढ़ता। क्रिटिकल थिंकिंग का विकास नहीं होता और वो खुद को एक्सप्रेस भी नहीं कर पाता है, जो आगे चलकर परेशानी खड़ी कर सकता है। -डॉ. राजेश पांडेय, हैलो साइकॉलजिस्ट चाइल्ड डिवेलपमेंट ऐंड करियर काउंसलिंग सेंटर
    पूछना चाहिए- मॉडरेशन मार्क्स किस साइंटफिक पद्धति से दिए जा रहे

    जब सीबीएसई ने साइंटफिक मैथड अपनाकर प्रश्नपत्र तैयार किया और स्टेप बाई स्टेप नंबर देने शुरू किए तो बच्चों के ज्यादा अंक भी आने लगे। इससे पास प्रतिशत भी बढ़ा, जिससे आगे चलकर 12वीं के बाद दूसरे बोर्ड के बच्चों को एडमिशन मिलने में दिक्कत होने लगी। दूसरे बोर्ड ने सैद्धांतिक पद्धति न अपना कर सीबीएसई में चल रही मॉडरेशन प्रॉसेस को अपनाया और मार्क्स देने शुरू किए। मौजूदा समय में सभी बोर्ड इन्हीं मार्क्स के सहारे पास प्रतिशत में इजाफा कर रहे हैं। अभिभावकों को सीधे तौर पर बोर्ड से पूछना चाहिए कि मॉडरेशन मार्क्स किस साइंटफिक पद्धति से दिए जा रहे हैं और कितने दिए जा रहे हैं।

    -पवनेश कुमार, पूर्व एग्जामिनेशन कंट्रोलर, सीबीएसई

    समाज में हो रहा गैर जरूरी प्रतिस्पर्धा का प्रसार

    10 से 20 फीसदी बच्चों को 90 और 10-15 फीसदी बच्चों को 95 फीसदी अंक खराब मूल्यांकन व्यवस्था की पहचान है। यह एक तरह से समाज में गैर जरूरी प्रतिस्पर्धा का प्रसार कर रही है, जो आगे चलकर समाज के साथ शिक्षा व्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाएगा। मूल्यांकन पद्धति पर परिवर्तन करने की जरूरत है। प्रश्नपत्र की डिजाइन से लेकर ब्लू प्रिंट में बदलाव लाना होगा। नैशनल असेसमेंट पॉलिसी को पूरी तरह बदलने की जरूरत है। कॉपी जांचने वाले शिक्षकों को भी पूरी ट्रेनिंग देनी होगी कि किस सवाल पर कितना जवाब देने पर कितने अंक दिए जाने चाहिए। साथ ही मूल्यांकन में गुणवत्ता बनाए रखने की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।

    - अशोक गांगुली, शिक्षाविद और सीबीएसई के पूर्व अध्यक्ष

    मेरिट में सर्वश्रेष्ठ बच्चों की सूची दिखाने की होड़

    हमारी शिक्षा व्यवस्था में मूल्यांकन व्यवस्था पूरी तरह मानवीय है। ऐसे में स्टैंडर्ड एरर मेजरमेंट 5-7% देखने को मिलता है। जैसे किसी बच्चे को 90 फीसदी अंक मिले तो उसके 83 फीसदी और 97 फीसदी अंक भी आ सकते थे। ऐसे में मेरिट लिस्ट में सर्वश्रेष्ठ बच्चों की सूची दिखाने की जो होड़ मची है, वह बच्चों को बच्चों से, अभिभावकों का अभिभावकों से, स्कूल का स्कूल से और बोर्ड से बोर्ड के बीच एक गैर जरूरी और अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा को जन्म दे रहा है, जिसे बंद कर दिया जाना चाहिए। परीक्षा की वैलिडिटी, रिलायबिलिटी और क्रेडिबिलटी बनाए रखने के लिए सही अंक देने चाहिए। - केएम त्रिपाठी, पूर्व सचिव, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड