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    Tuesday, 7 May 2019

    न्यायालय किसी नौकरी के लिए योग्यता और अनिवार्य अहर्ताओं का निर्धारक नही हो सकता: सुप्रीम कोर्ट

    न्यायालय किसी नौकरी के लिए योग्यता और अनिवार्य अहर्ताओं का निर्धारक नही हो सकता: सुप्रीम कोर्ट

    न्यायालय किसी नौकरी के लिए योग्यता और अनिवार्य अहर्ताओं का निर्धारक नही हो सकता: सुप्रीम कोर्ट

    (Courts Cannot Decide Eligibility And Essential Qualifications For Employment: SC)

    *✍🏼वैरागी*💯

    इस हेडलाइन को पढ़कर 40/45 के विरोधी ऐसे खुश हुए जैसे ये रिपोर्टेबल जजमेंट ही उनकी जीत का आधार बनेगा।😄

    आइए जाने क्या था मामला :


    यह अपील सचिव, महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग द्वारा उन अभ्यर्थियों के खिलाफ फ़ाइल की गई थी जिन्हें 2016 में हाइकोर्ट ने राहत देते हुए औषधि अन्वेषण एवं विकास संस्थान में सहायक आयुक्त (औषधि) एवम औषधि निरीक्षक पदों पर नियुक्ति देने का आदेश पारित किया था।

    हाई कोर्ट ने क्या कहा और किया :


    दरअसल इन पदों के लिए विज्ञापन 4 जनवरी 2012 और 31 मार्च 2015 को जारी हुए थे। जिसमें पद के अनुसार "अनिवार्य अहर्ता और वांछनीय अहर्ता" का जिक्र किया गया।  विज्ञापन की शर्तों के आधार पर जो भी अभ्यर्थी अनिवार्य अहर्ता के साथ साथ कुछ वांछनीय अहर्ता (अतिरिक्त योग्यता)  रखता होगा उसे नियुक्ति में प्राथमिकता दी जाएगी। इस तथ्य को हाई कोर्ट ने गलत तरीके से इंटरप्रिटेशन करके विज्ञापन की शर्त को बदलते हुए मनमाने ढंग से *वांछनीय योग्यता को अनिवार्य योग्यता में बदल दिया।* जो कि विज्ञापन की शर्तों के विपरीत था। जबकि नियमतः वांछनीय योग्यता कभी अनिवार्य योग्यता नही हो सकती।

    अब सुप्रीम कोर्ट का क्या इंटरप्रिटेशन रहा :


    सुप्रीम कोर्ट ने जब ये पाया कि हाइकोर्ट ने नौकरी के विज्ञापन में छेड़छाड़ करके योग्यता और अनिवार्य अहर्ताओं में ही बदलाव कर दिया जो कि पूर्णतया असंवैधानिक है। क्योंकि विज्ञापन जारी करने और उनकी योग्यता तय करने का अधिकार नियोक्ता को होता है न कि न्यायालय को। न्यायालय सिर्फ विज्ञापन में जारी शर्तों एवम समानता के मूल सिद्धांतों को पालन कराने के लिए होती है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए लोक सेवा आयोग की अपील को स्वीकार कर लिया।


    *अब 69000 भर्ती में इस जजमेंट का प्रभाव:*

    जो कुछ सुप्रीम कोर्ट ने किया वो बिल्कुल 40/45 उत्तीर्ण अंक मामले में लखनऊ पीठ के एकल बेंच द्वारा दिए गए जजमेंट के समानांतर ही है। 


    सुप्रीम कोर्ट ने भी यही कहा कि भर्ती सिर्फ विज्ञापन के अधीन शर्तो पर पूर्ण होगी। अब चूंकि 69000 के भर्ती परीक्षा के विज्ञापन किसी भी उत्तीर्ण अंक का जिक्र ही नही था तो फिर बाद में उत्तीर्ण अंक क्यों लगाया गया? एकल पीठ का पूरा फैसला विज्ञापन में निहित शर्तो के अनुरूप ही है।


    जिसमे टीम रिज़वान अंसारी पाई और कामा का भी परिवर्तन नही होने देगी। टीम तो सिर्फ विज्ञापन में निहित शर्तो के अनुपालन के लिए ही लड़ रही है। एकल बेंच में भी इसी बेस पर जीते थे,डिवीजन बेंच में भी जीत का यही आधार स्तम्भ होगा। ये जजमेंट हमारी सत्यता को पुष्टित करता है।


    जो लोग इस हेडलाइन को पढ़कर खुश हो लिए हों,कृपया वो अंदर के 10 पन्नो के जजमेंट पर भी एक नजर देख लें।

    ®टीम रिज़वान अंसारी।।
    (टेट सेवा समिति-उ0प्र0)

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