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    Monday, 12 August 2019

    free uniform 2019-20 ढूंढे नहीं मिल रहा तय मानक का कपड़ा, 75% सरकारी स्कूलों में नहीं मिली ड्रेस

    free uniform 2019-20 ढूंढे नहीं मिल रहा तय मानक का कपड़ा, 75% सरकारी स्कूलों में नहीं मिली ड्रेस



    केंद्र सरकार की टेक्सटाइल कमिटी ने ऐसा मानक तय कर दिया है कि सरकारी स्कूलों में ड्रेस के लिए कपड़ा ढूंढे नहीं मिल रहा। यही वजह है कि नया सत्र शुरू होने के एक महीने बाद भी राजधानी के ही 75% सरकारी स्कूलों में यूनिफॉर्म नहीं बांटी जा सकी है। इसके लिए बच्चों को अभी डेढ़ महीने और इंतजार करना पड़ सकता है।


    राजधानी के मोहनलालगंज इलाके के स्कूलों में खादी के ड्रेस बांटे जाने हैं। इसका जिम्मा खादी ग्रामोद्योग को दिया गया है। वहीं, बाकी इलाकों के ज्यादातर स्कूलों में यूनिफॉर्म सप्लाई का जिम्मा नैशनल रूरल लाइवलीहुड मिशन (एनआरएलएम) के तहत स्वयं सहायता समूहों के पास है, लेकिन इन्हें यूनिफॉर्म तैयार करने के लिए टेक्सटाइल कमिटी के मानक के मुताबिक कपड़ा ही नहीं मिल रहा। कमिटी के मानक के मुताबिक, ड्रेस के कपड़े में 67% कॉटन और 33% पॉलिएस्टर होना चाहिए।



     मिशन के डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर के मुताबिक, बड़ी मुश्किल से एक कंपनी ऐसा कपड़ा देने को तैयार हुई है, लेकिन सप्लाई में अभी करीब 25 दिन लगेंगे। इसके बाद यूनिफॉर्म तैयार होगी, फिर स्कूलों तक भेजी जाएगी।




    25% स्कूलों में बंटी ड्रेस
    मानक के मुताबिक कपड़ा न मिलने के कारण राजधानी में 25% स्कूलों में भी ड्रेस नहीं बांटी जा सकी है। बेसिक शिक्षा विभाग के डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर संतोष कुमार भी यह मानते हैं। उन्होंने बताया कि कई स्कूलों में स्कूल मैनेजमेंट कमिटी को यूनिफॉर्म बांटने का जिम्मा दिया गया था। वहां तो ड्रेस बांटी जा चुकी है। इसके लिए नैशनल रूरल लाइवलीहुड मिशन (एनआरएलएम) को एक लाख यूनिफॉर्म का ऑर्डर दिया गया था, लेकिन कपड़ा न मिलने के कारण मिशन अभी सप्लाई नहीं शुरू कर सका है।



    ■  नए मानक ने लगाया ड्रेस सप्लाई पर ब्रेक

    ★ 1.80 लाख से अधिक बच्चे पंजीकृत हो चुके हैं इन स्कूलों में अब तक
    ★ 67% कॉटन और 33% पॉलिएस्टर होना चाहिए कपड़े में
    ★ 15 जुलाई तक प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्कूलों में यूनिफॉर्म बंट जानी चाहिए थी शासनादेश के मुताबिक




    देरी होगी, अफसरों को बता दिया है
    एनआरएलएम को 1.02 लाख यूनिफॉर्म का ऑर्डर मिला है। इसमें 13 हजार यूनिफॉर्म पुराने मानकों के मुताबिक बनी थीं, लेकिन नए मानक के मुताबिक कपड़ा नहीं मिल पा रहा। इस कारण देरी हो रही है। अफसरों को सूचना दी गई है।सुखराम बंधु, डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर, एनआरएलएम



    इस तरह की व्यवस्था ही क्यों बनाई/
    स्कूलों में स्कूल मैनेजमेंट कमिटी की देखरेख में कपड़े खरीदे जाते हैं। फिर बच्चों की नाप लेकर दर्जी से यूनिफॉर्म सिलवाया जाता है। अगर स्वयं सहायता समूह से ही यूनिफॉर्म बंटवाना था तो स्कूल मैनेजमेंट कमिटी का औचित्य क्या है/ विनय कुमार सिंह, 
    प्रांतीय अध्यक्ष, प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षित स्नातक असो.



    डिमांड बढ़ने से नहीं मिल रहा कपड़ा
    डिमांड बढ़ने से मानक के मुताबिक कपड़ा मिलने में देरी हुई है, लेकिन जल्द ही स्कूलों में ड्रेस बांटने का काम पूरा कर लिया जाएगा।डॉ. अमरकांत सिंह, बीएसए



    पहले नहीं थे ऐसे नियम
    पिछले साल तक सरकारी स्कूलों के बच्चों को ड्रेस दिए जाने के मानक तय नहीं थे। जानकारों के मुताबिक, सप्लाई के लिए तीन फर्मों से रेट मांगे जाते थे। इसके बाद स्कूल मैनेजमेंट कमिटी और न्याय पंचायत मिलकर रेट और कपड़े की क्वॉलिटी के आधार पर यह तय करते थे कि किस फर्म को सप्लाई का काम दिया जाए। 



    बजट में धांधली की आशंका
    सरकारी पिछले साल तक एक यूनिफॉर्म के लिए 200 रुपये देती थी। इस साल यह रकम बढ़ाकर 300 रुपये कर दी गई है। इस रेट से नया बजट भी स्कूलों के हेड मास्टर और प्रबंध कमिटी के खाते में भेजा जा चुका है, लेकिन शिक्षक नेताओं के मुताबिक, कई स्कूलों में बेहद खराब क्वॉलिटी की ड्रेस दी गई है। इसके अलावा टाई-बेल्ट भी नहीं दिए गए हैं। ऐसे में ड्रेस के लिए मिले बजट में धांधली की भी आशंका है। 



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