शिक्षकों के दस्तावेज चेकिंग कमेटी को उच्च शिक्षकों ने बताया अपमान जनक, कम रैंक का अधिकारी अपने से उच्च अधिकारी की नही कर सकता जांच - Primary Ka Master Document News

 विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों के शिक्षकों की जांच का मामला प्रमुख संवाददाता-राज्य मुख्यालय प्रदेश के राज्य विश्वविद्यालयों, राजकीय महाविद्यालयों और सहायता प्राप्त महाविद्यालयों में तैनात शिक्षकों के भौतिक सत्यापन और उनके शैक्षणिक अभिलेखों की जांच के लिए कमेटी गठित करने के आदेश का विरोध शुरू हो गया है। शिक्षक इस आदेश को अपमानजनक मान रहे हैं।

शिक्षक संगठन कानूनी लड़ाई लड़ने के विकल्प पर भी विचार कर रहे हैं। बहस का विषय बना है मुद्दाशासन ने सभी जिलों में जिलाधिकारी की तरफ से नामित अपर जिलाधिकारी (एडीएम) को कमेटी का अध्यक्ष बनाया है। इसी तरह स्थलीय जांच के लिए जिलों में गठित होने वाली दो अलग-अलग उप समितियां में उप जिलाधिकारी (एसडीएम) को अध्यक्ष बनाया गया है। शासन के उच्च शिक्षा विभाग का यह आदेश जारी होते ही शिक्षकों में नाराजगी व्याप्त हो गई। विश्वविद्यालय व महाविद्यालय स्तर पर बने शिक्षकों के व्हाट्सएप ग्रुप में यह विषय बहस का मुद्दा बना हुआ है। उनका कहना है कि शिक्षकों को शासन से इस तरह के आदेश की उम्मीद नहीं थी। इस आदेश से तो कुलपतियों की भी जांच एसडीएम की अध्यक्षता वाली कमेटी करेगी, क्योंकि कुलपति भी किसी न किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैं। इसी तरह विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति, संकायाध्यक्ष व विभागाध्यक्ष तक की जांच भी एसडीएम करेंगे। शिक्षक संगठन इस आदेश का विरोध करने की रणनीति बनाने में जुटे हैं।कानूनी लड़ाई का विकल्प भी आजमाएंगेदीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष प्रो. विनोद कुमार सिंह ने कहा कि जांच का यह आदेश पूरी तरह अनुचित है। विश्वविद्यालय के शिक्षक की नियुक्ति कार्य परिषद करती है। कार्य परिषद ही उसकी जांच करा सकती है, कोई एसडीएम या तहसीलदार उसकी जांच कैसे कर सकता है? उन्होंने कहा कि अभी तक किसी विश्विवद्यालय या महाविद्यालय में फर्जी नियुक्ति का प्रकरण सामने नहीं आया है। लखनऊ विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के महामंत्री डॉ. विनीत वर्मा ने भी कहा कि इस मुद्दे पर शिक्षकों में काफी नाराजगी है। शिक्षकों की भावनाओं के अनुरूप निर्णय लिया जाएगा। उधर लखनऊ विश्वविद्यालय संबद्ध महाविद्यालय शिक्षक संघ (लुआक्टा) के अध्यक्ष डॉ. मनोज पांडेय ने कहा कि यह आदेश अपमानजनक होने के साथ-साथ संविधान विरोधी भी है। संविधान के अनुच्छेद 311 (डॉक्ट्रिन आफ प्लेजर) में में प्रावधान है कि किसी भी व्यक्ति की जांच उससे नीचे की रैंक वाला अफसर नहीं कर सकता है। जांच कमेटी के अध्यक्ष व सदस्यों का वेतनमान प्रोफेसरों से कम है। शासन ने अपना आदेश संशोधित नहीं किया तो संगठन कानूनी लड़ाई लड़ेगा। शिक्षकों को जांच से कोई इनकार नहीं है लेकिन जांच प्रक्रिया संविधानसम्मत होनी चाहिए।