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    Saturday, 17 November 2018

    2040 के जाड़े की एक सुबह, पेंशनविहीन प्राइमरी का मास्टर कहानी,बेसिक शिक्षा परिषद नौकरी का अंतिम का सच

    2040 के जाड़े की एक सुबह, पेंशनविहीन प्राइमरी का मास्टर कहानी, बेसिक शिक्षा परिषद नौकरी का अंतिम का सच


    कोहरे में कैद , दूर दूर तक फैला हुआ अँधेरा ।
    सुबह के 7 तो बज चुके है । मगर सूरज के दर्शन क्या उसकी एक किरण भी धरा तक पहुचने को तरस रही है ।
    राजकीय जूनियर हाईस्कूल के हेड मास्टर रामेन्द्र तिवारी का आवास ...
    क्या डैड ....बाहर निकलना हो तो बाहर निकल जाओ क्यों बार बार अंदर बाहर कर रहे हो ।

    कुछ नही बेटा , वो स्कूल का टाइम हो रहा था।
    और अँधेरा इतना है कि 10 मीटर भी सही से न  दिखे ।

    आप से कितनी बार कहा है कि अब तो मेडिकल ले लो ।
    दो महीने में रिटायरमेंट है ।
    पेंशन मिलनी नही है ।
    फिर भी जान दिए हो ।
    अभी बीमार पड़ जाओ , फिर तो सरकार भी इलाज नही करवाएगी ।
    ख़ास रहे हो , मगर स्कूल जाना है ।
    मास्टर साहब , लड़के की बातों को अनसुना सा करते हुए , बाहर निकल गए ।
    कुछ क्षण इधर उधर देखते रहे , जैसे कुछ बेहद गहरा सोंच रहे हो ।
    फिर बाउंड्री में खड़ी अपनी मोटर साइकिल को पोछने लगे ।
    नल खोल कर पानी बोतल में भरा , गाड़ी की टंकी में 4 लीटर पेट्रोल डालकर उसे सरकाते हुए सड़क पर लाए ।
    अभी कुछ सड़क दिखने लगी थी ।
    मगर विद्यालय तो घर से 32 किलोमीटर दूर है , जाने आगे रास्ते का क्या हाल हो ।
    कल लौटते समय गन्ने की ट्राली में फंसे वाहन की याद उनको अचानक आ गई , प्रशासन भी मुआवजा देकर अपना पल्ला झाड़ कर किनारे हो गया ।
    लेकिन इसमें नया क्या था , पिछले 37 सालों से ये तो रोज का तमाशा रहा है ।
    इधर कई बार सेल्फ दबाने पर गाड़ी स्टार्ट नही हुई ।
    इंजन की आवाज सुन कर बेटा बाहर आ गया ।
    गाडी को फिर से ऑफ कर , ऑन किया ।
    और फिर किक मारकर गाडी को स्टार्ट कर दिया ।
    मास्टर साहब ने बिना बेटे की तरफ देखे ही , एक्सीलेटर को पकड़ लिया ।
    गाडी की लाइट्स ऑन कर कोहरे को चीर कर आगे बढ़ चले ।
    लड़का तब तक खड़ा रहा , जब तक कोहरे में उसे गाडी के टेल लैम्प्स की लाल रौशनी दिखती रही ।
    सर से पैर तक कपड़ो से पैक होने के बाद भी हवाएं सरसरी बढ़ा रही थी ।
    अचानक तिवारी जी को बेटे की याद आ गई ।
    तीखा जरूर बोलता है , मगर मानता भी है ।
    बताओ क्या जरूरत थी , ब्लोअर और रजाई छोड़कर , बाहर आने की ।
    आगे से मुड़ना है , तिवारी जी को ये अपने दूसरे बेटे के मकान को देख कर याद आया ।वो अब उनके साथ नही रहता था तिवारी जी को याद आया कि बड़े बेटे की पढाई के लिए बैंक से उधार लिए गए पैसे वो 10 साल की किश्ते चुकाकर पिछले महीने ही निपटा पाए है ।
    उन्हें बड़े दिनों के बाद पूरी तनख्वाह हाथ में मिली थी ।
    मगर नौकरी मिलने पर बेटा अपन पत्नी के साथ अलग रहने लगा था ।

    अचानक तिवारी जी को अपने छोटे बेटे की बात याद आ गई ।मुझे रिटायर होने में सिर्फ 2 महीने बचे है ।
    समय कितनी जल्द बीत गया।
    37 साल , कैसे बीत गए ... पता ही नही चला ।
    मगर तभी उनको सर्दी का एहसास कुछ कम होने लगा ।
    उन्हें याद आया कि रिटायर होने के बाद तो उनको पेंशन भी नही मिलेगी ।
    मतलब दो महीने बाद वो क्या करेंगे ।
    अभी तो लड़का कॉलेज की पढाई पूरी कर तैयारी ही शुरू किया है ।
    उसको भी हर महीने खर्चा देना होगा ।
    ऊपर से पत्नी का बिगड़ता स्वास्थ्य ।

    घर का खर्च भी 60 हज़ार से कम क्या होगा महीने का ।
    बहुत कटौती करके भी 50 हज़ार में पूरा नही पड़ेगा ।
    फिर मैं कही काम कर लूंगा,
    *मगर इतने पैसो पर काम देगा कौन एक रिटायर्ड मास्टर को इसी ऊहापोह में रामेन्द्र तिवारी विद्यालय पहुँच जाते है ।
    एक भी छात्र नही आया था ।स्वयं विद्यालय खोल , ऑफिस को कपडे से झाड़कर , अगरबत्ती लगाते है ।
    कुछ बच्चे भी मास्टर साहब को आया देख , विद्यालय पहुचने लगते है ।
    मगर मास्टर साहब के कानों में तो आज बेटे के प्रश्न गूँज रहे थे ।वो कुर्सी पर बैठे बैठे ही उन सवालो का जवाब ढूंढने में लग जाते है ।
    मात्र एक बार , चाहे जितने दिन के लिए  ..... चुनाव जीतने  भर से नेता को जीवन भर पैंशन , भत्ता ,यात्रा टिकट की सुविधा और 37 साल से नौकरी कर रहे कर्मचारी को 60 साल बाद सिर्फ ठेंगा ।
    मास्टर साहब के पढ़ाए छात्र आज जाने कहाँ कहाँ तक पहुँच गए ।
    आज तिवारी जी को वो पहला दिन नौकरी का याद हो आया जब वो पैदल ही विद्यालय आए थे ,और  उसी दिन ठान लिए थे कि जब तक पढ़ाएंगे पूरे दम से पढ़ाएंगे ।*
    एक और दिन बीत जाता है,विद्यालय बंद करने का समय हो जाता है ।
    तभी एलआईसी वाले मिश्रा जी का फोन आ जाता है ।
    अबकी किश्त समय पर नही जमा करवाई थी ,
    उसी की रिमाइंडर के लिए ।
    आखिर 4 पालिसी है ।
    किस किस को याद रखे कोई ।तिवारी जी आज बड़ा थका महसूस कर रहे थे ।

    इतना कि बस बिस्तर पर गिर जाना चाहते थे ।
    जिंदगी भर के संघर्ष के बाद , आज उनके हाथ खाली थे ।बेटी की शादी , अपना घर , बच्चो की पढाई ।

    अचानक तिवारी जी की आँखे चमक उठी ।
    मोबाइल निकाल कर कुछ जोड़ घटाना करने लगे ।

    फिर पूरे आत्मविश्वास के साथ उठे ।
    गाडी स्टार्ट की और दौड़ा दी घर की तरफ ।
    4 बजते ही शाम होने लगी अगली सुबह अख़बार की सुर्खियों में समाचार छपा।

    घने कोहरे ने ली एक और जान,वरिष्ठ शिक्षक की मार्ग दुर्घटना में मौत।
    राज्य सरकार ने 10 लाख की मदद खाते में ट्रांसफर की ।
    शिक्षक संघ ने मृतक आश्रित कोटे से पुत्र को नौकरी दिलवाने का किया वादा ।
    और उधर मिश्रा जी भी परिवार की मदद के लिए जीवन बीमा के पैसे दिलवाने की जुगत में लग गए ।
                       
    सभी शिक्षक संगठनों एवं सरकार को सादर समर्पित
    लेखक - unknown