आपके लिए क्या है बेहतर पुरानी पेंशन या नई पेंशन ! 
Compare Between Old Pension And NPS


17 साल पहले नेशनल पेंशन सिस्टम ( एनपीएस ) लागू होने के बाद से ही सरकारी कर्मचारी पुरानी पेंशन व्यवस्था ( ओपीएस ) बहाल करने की मुहिम चला रहे हैं , विरोध में लाखों कर्मचारियों ने अभी तक एनपीएस नहीं अपनाया , जिससे भविष्य में आर्थिक संकट पैदा हो सकता है । 

एनपीएस में इम्युनिटी व ब्याज पर निर्भर करेगी पेंशन 


एनपीएस का रिटर्न पूरी तरह बाजार के अधीन होता है , जहाँ जोखिम को पूरी संभावना है , ऐसे में सरकारी कर्मचारियों को इस पर ज्यादा भरोसा नहीं हो पाता।

अगर एनपीएस लंबे समय तक चलाया जाए , तभी पेंशन के रूप में ठीक - ठाक राशि मिलती है , क्योंकि इस पर कर्मचारी के सेवाकाल का भी सीधा असर पड़ता है । 

एनपीएस लेने वाले कर्मचारी सेवानिवृत्त होने पर कुल रकम का 60 फीसदी एकमुश्त निकाल सकते हैं , जबकि 40 फीसदी से बीमा कंपनी का एन्युटी प्लान खरीदना होगा । 

इसी राशि पर मिलने वाला व्याज हर महीने पेंशन के रूप में दिया जाता है, स्पष्ट है कि , एन्युटी की राशि और उसका ब्याज जितना ज्यादा होगा , पेंशन भी उतनी अधिक मिलेगी ।

कर्मचारियों को ज्यादा भरोसा देती है ओपीएस 


नि वेश सलाहकार बलवंत जैन का कहना है कि पुरानी पेंशन व्यवस्था या औपीएस सरकारी कर्मचारियों को ज्यादा भरोसा और सुरक्षा प्रदान करती है , इसमें सरकार की ओर से तय लाभ दिया जाता है । 

1 जनवरी 2004 से एनपीएस लागू होने के पहले जब सरकारी कर्मचारी सेवानिवृत्त होता था , तो उसके अंतिम वेतन की 50 फीसदी राशि निश्चित तौर पर पेंशन के रूप में मिलती थी , इस पर कर्मचारी के सेवाकाल का कोई असर नहीं पड़ता था । 

इसके अलावा ओपीएस में हर साल महंगाई भत्ते के रूप में बढ़ोतरी के साथ नया वेतन आयोग लागू होने पर भी बड़ा इजाफा होता है , ओपीएस धारक की मौत होने पर उसकी पत्नी या अन्य आश्रित को पेंशन मिलती है।

जीपीएफ के मुकाबले कम फायदेमंद है एनपीएस 


केंद्र ने ओपीएस को यह कहते हुए बंद किया था कि इससे सरकार के खजाने पर बहुत बोझ पड़ता है , जाहिर है , सरकार ने अपना जोखिम कर्मचारियों पर डाल दिया।

एनपीएस आने के बाद सामान्य भविष्य निधि ( जीपीएफ ) को बंद कर दिया गया है , जिसमें पहले 12 फीसदी कर्मचारी का और 12 फीसदी नियोक्ता का निवेश होता था । 

एनपीएस में राज्य सरकार के कर्मचारी के मूल वेतन व डीए का 10 फीसदी कटता है और इतनी ही राशि नियोक्ता भी देता है, यानी जीपीएफ से 2 फीसदी कम । 

केंद्र के मामले में नियोक्ता का अंशदान 14 फीसदी है , लेकिन राज्य कर्मचारियों के लिए एनपीएस , पेंशन और बचत दोनों ही लिहाज से, जीपीएफ के मुकाबले नुकसान का सौदा है ।

ओपीएस नहीं है तो एनपीएस में समझदारी 


जिन कर्मचारियों ने एनपीएस नहीं चुना और जीपीएफ खाता भी नहीं खोला गया , उनका न तो खुद के वेतन से अंशदान हुआ है और न ही सरकार ने पैसे डाले । 

जैसे यूपी में सरकारी शिक्षिका राधा ने 2015 में नौकरी शुरू की और एनपीएस नहीं चुना , उनका जीपीएफ खाता भी नहीं है , एनपीएस खाता होता तो मूल वेतन और डीए मिलकर हर महीने औसतन 5,000 का अंशदान होता । 

इतनी ही राशि सरकार भी मिलाती तो छह साल में कुल 7.20 लाख की रकम जमा हो जाती , लिहाजा ओपीएस का विकल्प नहीं होने पर एनपीएस अपनाने में ही समझदारी है ।

निजी क्षेत्र और निवेश के लिए एनपीएस बेहतर 


एनपीएस की तुलना अगर पुरानी पेंशन से न करें और सिर्फ निवेश विकल्प के रूप में देखें , तो यह काफी आकर्षक लगती है , निजी क्षेत्र के लिए जहां सेवानिवृत्ति के बाद कोई सुरक्षा नहीं मिलती , वहां एनपीएस संजीवनी की तरह है । 

एनपीएस लागू होने के बाद से अब तक सालाना औसतन 10 फीसदी रिटर्न मिला है , इस लिहाज से 25 साल से ज्यादा के सेवाकाल में छोटे निवेश से भी बड़ी रकम तैयार हो सकती है । एन्युटी की राशि ज्यादा होने पर आपको पेंशन भी बेहतर मिलेगी ।